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Parshuram Jayanti Ki Katha in Hindi PDF | परशुराम जयंती 2026: संपूर्ण व्रत कथा और महत्व

Parshuram Jayanti Ki Katha 2026: परशुराम पूजा में पढ़ें यह पावन कथा, जीवन से मिट जाएगा हर संकट

Parshuram Jayanti Ki Katha 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान विष्णु के छठे अवतार ‘भगवान परशुराम’ का अवतरण (जन्म) हुआ था, इस दिन को अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। भगवान परशुराम को शक्ति, ज्ञान, अनुशासन और धर्म की रक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।। भगवान परशुराम को शक्ति, ज्ञान, अनुशासन और धर्म की रक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

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Parshuram Jayanti Ki Katha in Hindi PDF
Parshuram Jayanti Ki Katha in Hindi PDF

इस वर्ष परशुराम जयंती का यह पावन पर्व 19 अप्रैल 2026 (रविवार) को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, परशुराम जी की पूजा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक कि उनकी प्रामाणिक कथा (Parshuram Katha) का पाठ न किया जाए। Freeupay.in के इस विशेष लेख में पढ़ें भगवान परशुराम के जन्म और उनके पराक्रम की वह पौराणिक कथा, जिसे पढ़ने और सुनने मात्र से व्यक्ति के अंदर अपार साहस और आत्मविश्वास भर जाता है।

🕰️ 2026 में परशुराम जयंती पूजा का सटीक ‘शुभ मुहूर्त’ (Parshuram Jayanti 2026 Date)

हिन्दू पंचांग के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म शाम के समय (प्रदोष काल) में हुआ था, इसलिए इनकी पूजा संध्या काल में करना सबसे उत्तम माना जाता है:

विवरण (Event)तारीख और समय (Date & Time)
परशुराम जयंती की तारीख19 अप्रैल 2026 (रविवार)
तृतीया तिथि आरंभ19 अप्रैल 2026, सुबह 10:49 बजे से
तृतीया तिथि समाप्त20 अप्रैल 2026, सुबह 07:27 बजे तक
प्रदोष काल (शाम की पूजा का सर्वोत्तम मुहूर्त)शाम 06:49 बजे से रात 08:12 बजे तक

(नोट: 19 अप्रैल की शाम इसी शुभ मुहूर्त में भगवान परशुराम की तस्वीर या मूर्ति के सामने दीपक जलाकर इस परशुराम जयंती कथा का पाठ करें।)

परशुराम जयंती कब आती हैं? (Parshuram Jayanti)

परशुराम जयंती हिन्दू पंचांग के वैशाख माह की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। इसे “परशुराम द्वादशी” भी कहा जाता है। अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन दिये गए पुण्य का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता। अक्षय तृतीया से त्रेता युग का आरंभ माना जाता है. इस दिन का विशेष महत्व है।

भगवान परशुराम का इतिहास

भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाले अधिक लोग हैं। मध्य कालीन समय के बाद जब से हिन्दू धर्म का पुनुरोद्धार हुआ है, तब से परशुराम जयंती का महत्व और अधिक बढ़ गया है। इस दिन उपवास के साथ साथ सर्व ब्राह्मण का जुलूस, सत्संग भी सम्पन्न किए जाते हैं।

परशुराम शब्द का अर्थ

परशुराम दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है। परशु अर्थात “कुल्हाड़ी” तथा “राम”। इन दो शब्दों को मिलाने पर “कुल्हाड़ी के साथ राम” अर्थ निकलता है। जैसे राम, भगवान विष्णु के अवतार हैं, उसी प्रकार परशुराम भी विष्णु के अवतार हैं। इसलिए परशुराम को भी विष्णुजी तथा रामजी के समान शक्तिशाली माना जाता है। परशुराम के अनेक नाम हैं। इन्हें रामभद्र, भार्गव, भृगुपति, भृगुवंशी (ऋषि भृगु के वंशज), जमदग्न्य (जमदग्नि के पुत्र) के नाम से भी जाना जाता है।

कौन हैं परशुराम? (Who is Parshuram)

परशुराम ऋषि जमादग्नि तथा रेणुका के पांचवें पुत्र थे। ऋषि जमादग्नि सप्तऋषि में से एक ऋषि थे। भगवान विष्णु के 6वें अवतार के रूप में परशुराम पृथ्वी पर अवतरित हुए। परशुराम वीरता के साक्षात उदाहरण थे। हिन्दू धर्म में परशुराम के बारे में यह मान्यता है कि वे त्रेता युग एवं द्वापर युग से अमर हैं। परशुराम की त्रेता युग दौरान रामायण में तथा द्वापर युग के दौरान महाभारत में अहम भूमिका है। रामायण में सीता के स्वयंवरमें भगवान राम द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष तोड़ने पर परशुराम सबसे अधिक क्रोधित हुए थे।

परशुराम जी का जन्म कँहा हुआ

परशुराम के जन्म एवं जन्मस्थान के पीछे कई मान्यताएँ एवं अनसुलझे सवाल है। सभी की अलग अलग राय एवं अलग अलग विश्वास हैं। एक और मान्यता के अनुसार मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के पास स्थित महू से कुछ ही दूरी पर स्थित है जानापाव की पहाड़ी पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। यहां पर परशुराम के पिता ऋर्षि जमदग्नि का आश्रम था। कहते हैं कि प्रचीन काल में इंदौर के पास ही मुंडी गांव में स्थित रेणुका पर्वत पर माता रेणुका रहती थीं।

एक और मान्यता के अनुसार रेणुका तीर्थ पर परशुराम के जन्म के पूर्व जमदग्नि एवं उनकी पत्नी रेणुका ने शिवजी की तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर शिवजी ने वरदान दिया और स्वयं विष्णु ने रेणुका के गर्भ से जमदग्नि के पांचवें पुत्र के रूप में इस धरती पर जन्म लिया. उन्होनें अपने इस पुत्र का नाम “रामभद्र” रखा।

परशुराम के अगले जन्म के पीछे बहुत सी दिलचस्प मान्यता है. एसा माना जाता है कि वे भगवान विष्णु के दसवें अवतार में “कल्कि” के रूप में फिर एक बार पृथ्वी पर अवतरित होंगे। हिंदुओं के अनुसार यह भगवान विष्णु का धरती पर अंतिम अवतार होगा. इसी के साथ कलियुग की समाप्ति होगी।

परशुराम का परिवार एवं कुल

परशुराम सप्तऋषि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे पुत्र थे। ऋषि जमदग्नि के पिता का नाम ऋषि ऋचिका तथा ऋषि ऋचिका, प्रख्यात संत भृगु के पुत्र थे। ऋषि भृगु के पिता का नाम च्यावणा था। ऋचिका ऋषि धनुर्वेद तथा युद्धकला में अत्यंत निपुण थे। अपने पूर्वजों कि तरह ऋषि जमदग्नि भी युद्ध में कुशल योद्धा थे। जमदग्नि के पांचों पुत्रों वासू, विस्वा वासू, ब्रिहुध्यनु, बृत्वकन्व तथा परशुराम में परशुराम ही सबसे कुशल एवं निपुण योद्धा एवं सभी प्रकार से युद्धकला में दक्ष थे. परशुराम भारद्वाज एवं कश्यप गोत्र के कुलगुरु भी माने जाते हैं।

भगवान परशुराम अस्त्र

परशुराम का मुख्य अस्त्र “कुल्हाड़ी” माना जाता है। इसे फारसा, परशु भी कहा जाता है। परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे तो थे, परंतु उनमे युद्ध आदि में अधिक रुचि थी। इसीलिए उनके पूर्वज च्यावणा, भृगु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की आज्ञा दी। अपने पूर्वजों कि आज्ञा से परशुराम ने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया।

शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। तब परशुराम ने हाथ जोड़कर शिवजी की वंदना करते हुए शिवजी से दिव्य अस्त्र तथा युद्ध में निपुण होने कि कला का वर मांगा। शिवजी ने परशुराम को युद्धकला में निपुणता के लिए उन्हें तीर्थ यात्रा की आज्ञा दी। तब परशुराम ने उड़ीसा के महेन्द्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर शिवजी की कठिन एवं घोर तपस्या की।

उनकी इस तपस्या से एक बार फिर शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होनें परशुराम को वरदान देते हुए कहा कि परशुराम का जन्म धरती के राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ है। इसीलिए भगवान शिवजी ने परशुराम को, देवताओं के सभी शत्रु, दैत्य, राक्षस तथा दानवों को मारने में सक्षमता का वरदान दिया।

परशुराम युद्धकला में निपुण थे. हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले ज्ञानी, पंडित कहते हैं कि धरती पर रहने वालों में परशुराम और रावण के पुत्र इंद्रजीत को ही सबसे खतरनाक, अद्वितीय और शक्तिशाली अस्त्र – ब्रह्मांड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र तथा पशुपत अस्त्र प्राप्त थे. परशुराम शिवजी के उपासक थे. उन्होनें सबसे कठिन युद्धकला “कलारिपायट्टू” की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की. शिवजी की कृपा से उन्हें कई देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्राप्त हुए थे. “विजया” उनका धनुष कमान था, जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था।

📖 भगवान परशुराम की प्रामाणिक कथा (Bhagwan Parshuram Story in Hindi)

19 अप्रैल की शाम को पूजा करते समय हाथ में फूल और अक्षत (चावल) लेकर इस तेजस्वी कथा का पाठ करें:

महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर जन्म

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भृगु वंश के महान ऋषि जमदग्नि और उनकी पत्नी माता रेणुका ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन प्रदोष काल में भगवान विष्णु ने स्वयं उनके घर छठे अवतार के रूप में जन्म लिया। उनके बचपन का नाम ‘राम’ था। वे बचपन से ही परम शिव भक्त थे। भगवान शिव ने ही उन्हें प्रसन्न होकर एक दिव्य अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) प्रदान किया था, जिसके बाद उनका नाम ‘परशुराम’ पड़ा।

सहस्रबाहु अर्जुन का अहंकार और कामधेनु गाय का हरण

उस समय महिष्मती नगरी पर हैहय वंश के अत्यंत बलशाली और अहंकारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) का राज था। उसे अपनी हजार भुजाओं और शक्ति का बहुत घमंड था। एक दिन सहस्रबाहु अपने सैनिकों के साथ शिकार खेलते हुए महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा। महर्षि ने देवराज इंद्र से प्राप्त चमत्कारी ‘कामधेनु गाय’ की मदद से पूरी सेना का शाही सत्कार किया। कामधेनु की इस अद्भुत शक्ति को देखकर सहस्रबाहु के मन में लालच आ गया और उसने बलपूर्वक वह कामधेनु गाय महर्षि से छीन ली।

परशुराम जी का क्रोध और सहस्रबाहु का वध

जब भगवान परशुराम आश्रम लौटे और उन्हें राजा के इस अधर्म का पता चला, तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने अपना फरसा उठाया और महिष्मती नगरी पहुंच गए। परशुराम जी ने अकेले ही सहस्रबाहु की पूरी सेना को नष्ट कर दिया और उसके हजार हाथों को काटकर उसका वध कर दिया। इसके बाद वे कामधेनु गाय को वापस आश्रम ले आए।

धर्म की स्थापना का संदेश

भगवान परशुराम का अवतार केवल क्रोध का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह इस बात का संदेश है कि जब-जब सत्ता और शक्ति के नशे में कोई अधर्म करेगा, तब-तब धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना अनिवार्य है। वे ब्राह्मण कुल में जन्मे, लेकिन उनके कर्म क्षत्रियों जैसे थे। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अनुशासन और साहस होना सबसे जरूरी है।

(कथा समाप्त। बोलो भगवान परशुराम की जय!)

🌟 प्रसिद्ध ज्योतिषी की सलाह: 19 अप्रैल को करें ये अचूक उपाय

प्रसिद्ध ज्योतिषी और वास्तु विशेषज्ञ पंडित ललित त्रिवेदी जी बताते हैं कि राजस्थान, विशेषकर कोटपूतली और आस-पास के क्षेत्रों में परशुराम जयंती का अत्यधिक धार्मिक महत्व है।

जो लोग कोर्ट-कचहरी के मुकदमों, अज्ञात शत्रुओं या आत्मविश्वास की कमी से परेशान हैं, उन्हें 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम की आराधना अवश्य करनी चाहिए। अपनी कुंडली में मंगल (Mars) और सूर्य (Sun) ग्रह को बलवान करने के लिए इस दिन लाल चंदन, लाल फूल और गुड़ का दान करें। इसके साथ ही, जीवन में साहस, निडरता और हर कार्य में विजय प्राप्त करने के लिए सिद्ध किया हुआ ‘6 मुखी रुद्राक्ष’ (जो भगवान कार्तिकेय और मंगल का स्वरूप है) गले में धारण करना एक अचूक ‘रक्षा कवच’ का काम करता है।

⚠️ परशुराम जयंती पर रखें इन 3 नियमों का ध्यान (Do’s and Don’ts)

  1. शाम की पूजा अनिवार्य: भगवान परशुराम का जन्म गोधूलि बेला (प्रदोष काल) में हुआ था, इसलिए उनकी मुख्य पूजा शाम के समय ही करनी चाहिए।
  2. सात्विकता का पालन: यह दिन अक्षय तृतीया का भी है। इस दिन घर में पूर्ण सात्विकता रखें। मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का भूलकर भी सेवन न करें।
  3. अन्न दान का महत्व: 19 अप्रैल को जरूरतमंदों को सत्तू, जल से भरा कलश, खरबूजा और अन्न का दान करना कभी क्षय न होने वाला (अक्षय) पुण्य प्रदान करता है।

Parshuram Jayanti Ki Katha in Hindi PDF 2026❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया एक ही दिन क्यों मनाई जाती है?

Ans: वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया कहा जाता है और युगों पहले इसी पावन तिथि पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। इसलिए ये दोनों पर्व हमेशा एक ही दिन मनाए जाते हैं।

Q2: भगवान परशुराम की पूजा में क्या चढ़ाना चाहिए?

Ans: परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार और शिव के परम भक्त हैं। इसलिए उन्हें तुलसी दल, पीले फूल, लाल चंदन और मिठाई (विशेषकर बेसन के लड्डू) का भोग लगाना चाहिए।

Q3: क्या घर में भगवान परशुराम की मूर्ति रख सकते हैं?

Ans: हाँ, आप घर के मंदिर में भगवान परशुराम की सौम्य मुद्रा (आशीर्वाद देते हुए) वाली तस्वीर या मूर्ति रख सकते हैं। क्रोधित या युद्ध करते हुए रूप की तस्वीर घर में नहीं रखनी चाहिए।

निष्कर्ष: भगवान परशुराम अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की असीम प्रेरणा हैं। आने वाली 19 अप्रैल 2026 को Freeupay.in पर दी गई इस ओजस्वी कथा का पूरे परिवार के साथ पाठ करें। भगवान परशुराम आपके घर को हर बुरी नजर और शत्रु से सुरक्षित रखेंगे।

अभी तुरंत शेयर करें: परशुराम जयंती बस आने ही वाली है! इस प्रामाणिक कथा और पूजा के ‘सटीक मुहूर्त’ को अपने परिवार, रिश्तेदारों और सभी WhatsApp ग्रुप्स में तुरंत शेयर करें ताकि हर कोई 19 अप्रैल को सही समय पर पूजा कर सके।

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