Dasha Mata Vrat Katha 2026: पूजा में पढ़ें राजा नल-दमयंती की यह कथा, पलट जाएगी आपके घर की ‘दशा’
Dasha Mata Vrat Katha 2026: हमारे हिंदू पंचांग के अनुसार, हर चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को ‘दशा माता’ का व्रत किया जाता है। इस साल यह शुभ तिथि 13 मार्च 2026 (शुक्रवार) को आ रही है।
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आपको ऐसा लगें की, जब आपके घर की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही हो, आपके बनते हुए काम बिगड़ रहे हैं और आपके जीवन में ‘बुरी दशा’ चल रही हो, तब सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और भाग्योदय के लिए यह व्रत रखती हैं। दशा माता की पूजा पीपल के पेड़ के नीचे की जाती है, लेकिन यह पूजा तब तक अधूरी है जब तक कि राजा नल और दमयंती की कथा (Vrat Katha) न पढ़ी जाए। Freeupay.in के इस विशेष लेख में पढ़ें दशा माता की संपूर्ण प्रामाणिक कथा।
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🕰️ दशा माता व्रत 2026: शुभ मुहूर्त का समय
दशा माता व्रत रखने वालों के लिए दशमी तिथि का सही समय जानना सबसे जरूरी है:
| विवरण (Event) | तारीख और समय (Date & Time) |
| दशा माता व्रत की तारीख | 13 मार्च 2026 (शुक्रवार) |
| तिथि शुरू | 13 मार्च 2026, सुबह 06:29 बजे से |
| तिथि समाप्त | 14 मार्च 2026, सुबह 08:11 बजे तक |
📖 दशा माता व्रत कथा (Dasha Mata Story in Hindi)
दशा माता व्रत (13 मार्च) की सुबह को पीपल के पेड़ की पूजा करते समय हाथ में कच्चे सूत का धागा (डोरा) लेकर इस कथा का पाठ करें:
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राजकुमार के हाथ से लड्डू छिना
एक राजा था। उसकी दो रानिया थी। बड़ी रानी के संतान नहीं थी। छोटी रानी के पुत्र था। राजा छोटी रानी और राजकुमार को बहुत प्यार करता था। बड़ी रानी छोटी रानी से ईर्ष्या करने लगी। बड़ी रानी राजकुमार के प्राण हर लेना चाहती थी। एक दिन राजकुमार खेलता-खेलता बड़ी रानी के चोक में चला गया। बड़ी रानी ने राजकुमार के गले मई एक कला साँप डाल दिया।
छोटी रानी दशा माता का व्रत करती थी राजकुमार दशा माता का ही दिया हुआ था। दशामाता की कृपा से राजकुमार के गले में साँप बिना नुकसान पहुचाये चला गया। दूसरे दिन बड़ी रानी ने लड्डूओ में जहर मिला कर राजकुमार को खाने के लिए दिए। राजकुमार जैसे ही लड्डू खाने लगा तो दशामाता एक दासी का रूप धारण कर आयी और राजकुमार के हाथ से लड्डू छीन लिए।
दशा माता का अपमान
बड़ी रानी का यह वार भी खाली गया। रानी को बड़ी चिंता हुई की किसी भी तरह से राजकुमार को मारना हैं। तीसरे दिन जब राजकुमार फिर बड़ी रानी के आँगन में खेलने गया तो रानी ने उसे पकड़ कर गहरे कुवे में धकेल दिया। चूंकि कुवा बड़ी रानी के आँगन में बना था इसलिए किसी को भी पता नहीं चला की राजकुमार कहा गया लेकिन जैसे ही बड़ी रानी ने राजकुमार को कुवे में धकेला तो दशामाता ने उसे बीच में ही रोक लिया।
इधर दोपहर हो जाने पर राजकुमार के न लौटने पर राजा व छोटी रानी को चिंता सताने लगी। दशामाता को भी इस बात की चिंता हुई राजुकमार को उसके माता-पिता के पास किस प्रकार पहुचाया जाये? राजकुमार को तलाश करने वाले कर्मचारी निराश होकर बैठ गए। राजा व छोटी रानी पुत्र शोक में रोने लगे। तब दशामाता ने भिखारी का रूप धारण किया और राजकुमार को गले से लगाए राजद्वार पर पहुची।
वह राजकुमार को एक वस्त्र में छिपाये हुए भिक्षया मांगने लगी। सिपाहियों ने उसे दुत्कार कर कहा – ‘तुझे भिक्ष्या के पड़ी हे और यह राजकुमार खो गया हैं। सारे लोग दुःख और चिंता से व्याकुल हो रहे हे।’ इस पर दशामाता बोली – ‘भाइयो ! पुण्य का प्रभाव बड़ा ही विचित्र होता हैं। यदि मुझे भिक्षया मिल जाये तो संभव हे की खोया हुआ राजकुमार तुम लोगो को मिल जाये।
बुरी दशा की शुरुआत
यह कहकर वह देहरी पर पैर रखने लगी। सिपाहियों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका। उसी समय दशामाता ने बालक का पैर वस्त्र से बहर कर दिया। सिपाहियों ने समझा की कुँवर उसके हाथो में है इसलिए उसे अंदर जाने दिया। दशामाता कुँवर को लिए हुए भीतर चली गयी। उसने राजकुमार को चोक में छोड़ दिया और वापस चली गयी, परन्तु रानी ने दशामाता रूपी भिखारिन को देख लिया था। उसने कहा की-‘ खड़ी रहो और कोन हो तुम? तुमने तीन दिन मेरे बेटे को छिपाकर रखा था। तुमने ऐसा क्यों किया? तुम्हे मेरे इस प्रश्न का उत्तर देना होगा।
दशामाता उसी समय ठहर गयी। उन्होंने बताया की -‘ में तुम्हारे पुत्र की चोरी करने वाली नहीं हूँ। में तो तुम्हारी आरध्या देवी दशामाता हूँ। में तुम्हे सचेत करने आयी हु की बड़ी रानी तुम से ईर्ष्या रखती हैं। वह तुम्हारे पुत्र के प्राण हर लेना चाहती है। एक बार उसने तुम्हारे पुत्र के गले में कला साँप डाला था। जिसे मैंने भगाया। दूसरे बार उसने इसे विष के लड्डू खाने को दिए थे।
जिन्हें मैंने उसके हाथो से छीन लिए थे। इस बार उसने तुम्हारे उसने राजकुमार को अपने आँगन के कुवे में धकेल दिया था और मैंने इस बीच में ही रोक कर रक्ष्या की। इस समय में भिखारिन के वेश में तुम्हे सचेत करने आयी हूँ। ’यह सुनकर छोटी रानी दशामाता के पैरो में गिरकर शमा मांगने लगी।
पश्चाताप और फिर से भाग्योदय
छोटी रानी विनती भाव से बोली – ‘जैसी कृपा आपने मुझ पर दर्शन देकर की है। में चाहती हु की आप सदैव इस महल में निवास करे। मुझसे जो सेवा पूजा होगी में करुँगी। ’इस पर दशामाता बोली की – ‘में किसी घर में नहीं रहती। जो श्रद्धापूर्वक मेरा ध्यान, स्मरण करता हे में उसी के ह्रदय में निवास करती हूँ। मेने तुम्हे साक्ष्यात दर्शन दिए हैं। इसलिए तुम सुहागिनों को बुला कर उन्हें यथाविधि आदर -सत्कार के साथ भोजन कराओ और नगर में ढिंडोरा पिटवा दो की सभी लोग मेरा डोरा ले और व्रत करे।’
इतना कहकर दशामाता अंतर्ध्यान हो गयी। रानी ने अपने राज्य की सौभाग्यवती स्त्रियो को निमंत्रण देकर बुलाया और उबटन से लेकर शिरोभूषण शंगार कर उनकी यथा विधि सेवा कर भोजन करवाया और दक्षिणा में गहने आदि देकर विदा किया। रानी ने अपने राज्य में ढिंडोरा पिटवा दिया की अब से सब लोग दशामाता का डोरा लिया करे।
(कथा समाप्त। बोलो दशा माता की जय!)
🧵 दशा माता के ‘डोरे’ का रहस्य (10 धागे और 10 गांठ)
दशा माता की पूजा में ‘डोरा’ (धागा) सबसे महत्वपूर्ण होता है।
- आपको पूजा करने से पहले एक कच्चे सूत (Cotton thread) के धागे को 10 बार लपेट कर एक डोरा बना लें।
- उसमें बाद उसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर 10 गांठें (Knots) लगा लें।
- इसके बाद अब पीपल पेड़ की पूजा करते समय इस डोरे पर हल्दी लगाकर इसे माता के चरणों में रखें और व्रत कथा पूरी होने के बाद इसे अपने गले में पूरे साल भर के लिए पहन लें। यह आपके लिए एक अचूक रक्षा कवच का काम करेगा।
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🌟 प्रसिद्ध ज्योतिषी की सलाह: दशा माता व्रत का ज्योतिषीय महत्व
प्रसिद्ध ज्योतिषी और वास्तु विशेषज्ञ पंडित ललित त्रिवेदी जी बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में ‘दशा’ (महादशा और अंतर्दशा) का सीधा संबंध हमारे ग्रहों से होता है। पीपल के पेड़ में भगवान विष्णु (गुरु ग्रह) और शनि देव दोनों का वास माना गया है। जब कोई व्यक्ति 13 मार्च को पीपल के पेड़ की परिक्रमा करता है और दशा माता का व्रत रखता है, तो उसकी कुंडली में चल रही ‘राहु-केतु’ और ‘शनि की साढ़ेसाती’ की बुरी दशाएं तुरंत शांत हो जाती हैं। बिगड़े हुए काम बनने लगते हैं और घर में धन का आगमन शुरू हो जाता है।
⚠️ दशा माता व्रत के 3 अहम नियम (Fasting Rules)
दशा माता (13 मार्च) का व्रत रखने वाली महिलाएं नीचे दी गई इन बातों का विशेष ध्यान जरुर रखें:
- नमक का त्याग: इस दशा माता व्रत वाले दिन को एक ही समय भोजन करना चाहिए और उस भोजन में नमक का प्रयोग बिल्कुल भी ना करें (केवल मीठा भोजन ग्रहण करें)।
- अन्न का प्रकार: इस दशा माता पूजा के समय प्रसाद के रूप में केवल गेहूं से बना भोजन (जैसे मीठी पूड़ी, हलवा) ही बनाया और खाया जाता है।
- पुराने डोरे का विसर्जन: यदि आपके गले में पिछले साल का दशा माता पूजा का डोरा बंधा है, तो कल नया डोरा पहनने से पहले पुराने डोरे को पीपल की जड़ में मिट्टी में दबा दें या किसी पवित्र नदी में विसर्जित (बहा) कर दें।
इसे भी पढ़ें ➤ दशा माता व्रत पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और सामग्री लिस्ट
Dasha Mata Vrat Katha in Hindi ❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: दशा माता की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
Ans: 13 मार्च 2026 (शुक्रवार) को दशा माता की पूजा सुबह 06:53 बजे से 11:19 बजे के बीच करना सबसे फलदायी रहेगा।
Q2: क्या कुंवारी कन्याएं दशा माता का व्रत कर सकती हैं?
Ans: यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने परिवार और पति की सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इसलिए इसे सुहागिनों का व्रत माना जाता है।
Q3: घर की बुरी दशा सुधारने के लिए क्या दान करें?
Ans: कल के दिन व्रत खोलने से पहले किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को गेहूं और गुड़ का दान करने से घर की दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है।
निष्कर्ष: दशा माता का व्रत हमारे अहंकार को मिटाकर ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश देता है। कल 13 मार्च 2026 को Freeupay.in पर दी गई इस प्रामाणिक कथा का पाठ करें और पीपल देवता की परिक्रमा करें। माता रानी आपके घर की हर बुरी दशा को अच्छे दिनों में बदल देंगी।
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