गणपति अथर्वशीर्ष | Ganapati Atharvashirsha (The Ganesha Upanishad) | Full Text & Benefits Ganapati Atharvashirsha पाठ पढ़ना बहुत ही लाभकारी है। जिस भी जातक की कुंडली में बुध ग्रह दशा, अन्तर्दशा या गोचर में अशुभ परिणाम दे रहा हो या कुंडली में अशुभ स्थान पर बैठा हो तो Ganapati Atharvashirsha का पाठ पढ़ने से एसी परेशानी दूर हो जाती है। Ganapati Atharvashirsha का पाठ पढ़ने से भगवान श्री गणेश जी आपसे खुश रहते है। जो भी जातक Ganapati Atharvashirsha का पाठ नियम रूप से करता है उसके जीवन में आर्थिक समस्या, व्यापार में हानि, स्वास्थ्य समस्या आदि परेशानी तंग नही करती है। इसके साथ साथ उस जातक को बुद्धि, धन, ज्ञान, यश, सम्मान आदि की प्राप्ति होती है।
हर संकट और बाधा को दूर करने वाला गणपति अथर्वशीर्ष | For Success in All Ventures, Recite the Ganapati Atharvashirsha Daily
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ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ता सि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्व साक्षादात्मासि नित्यम्। ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि। अव त्व मांम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अवा नूचानमव शिष्यम्।अव पश्चातात्।अव पुरस्तात्। अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्। Ganapati Atharvashirsha
अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्। त्वं वाङ्मय स्त्वं चिन्मयः। त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानंदात् द्वितीयोसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोसि। सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्त स्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि वयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोनलो निलो नभः। त्वं चत्वारि वाकूपदानि। त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधार स्थितोसि नित्यं। त्वं शक्ति त्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।
गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्। अनुस्वार: परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्व रूपम्। गकार: पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरूत्तररूपम्। नाद: संधानम्। सँ हितासंधि: सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि: निचृद्गायत्रीच्छंदः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः। एकदंताय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्। एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुश धारिणम्। रदं च वरदं हस्तै र्विभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तं लंबोदरं शूर्प कर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगंधानु लिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्। भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारण मच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते पुरुषात्परम्। एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः।
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नम: प्रमथपतये। नमस्ते अस्तु लंबोदरायै एकदंताय। विघ्ननाशिने शिवसुताय। श्रीवरदमूर्तये नमो नमः। एतदथर्व शीर्ष योधीते। स ब्रह्म भूयाय कल्पते। स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते। स सर्वत: सुखमेधते। स पच्चमहापापात्प्रमुच्यते। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायं प्रात: प्रयुंजानो अपापो भवति। सर्वत्राधीयानो ड पविघ्नो भवति। धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति। इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहात् दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तंतमनेन साधयेत्। अनेन गणपति मभिषिंचति स वाग्मी भवति ।
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति स विद्यावान भवति। इत्यथर्वण वाक्यम्। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति। यो दूर्वांकुरैंर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेधावान भवति। यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फल मवाप्रोति। य: साज्यसमिद्भि र्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्य वर्चस्वी भवति। सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमा संनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति। महाविघ्नात् प्रमुच्यते। महादोषात् प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते। स सर्वविद् भवति से सर्वविद् भवति । य एवं वेद इत्युपनिषद्।
इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष सम्पुर्ण ॥ Iti Sri Ganapati Atharvashirsha
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