मंत्रगर्भ दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनाम (PDF) लिरिक्स, अर्थ और पाठ विधि Mantra Garbha Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram Lyrics in Sanskrit & Hindi भगवान श्री दत्तात्रेय जी भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मिलकर रूप बनाया हैं। भगवान श्री दत्तात्रेय जी एक संत है जिनके बारे में हिन्दू पुराणों में पढ़ने को मिल जायेगा। भगवान श्री दत्तात्रेय जी अनसूया और महर्षि अत्री के पुत्र हैं।
दत्तात्रेय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हैं का इसका दत्त और अत्री जिसमे दत्त का अर्थ है साधना और अत्री (ऋषि अत्री उनके पिता जी)। भगवान श्री दत्तात्रेय जी को प्रकृति यानी पर्यावरण शिक्षा के गुरु के रूप में माना जाता है। श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनामावली का नियमित रूप से जो व्यक्ति पाठ करता है उसे मानसिक परेशानी नही रहती हैं उसका मन शांत रहता हैं। मन्त्र गर्भ दत्तात्रेय शतनामावली स्तोत्रम आदि के बारे में बताने जा रहे हैं।
मंत्रगर्भ दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनाम (Lyrics) | Shri Dattatreya Mantra Garbha Ashtottara Shatanama Stotram PDF Download: 108 Names, Benefits & Chanting Rules
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मंत्रगर्भ दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनाम (PDF Download) | Shri Dattatreya Mantra Garbha Ashtottara Shatanama Stotram Lyrics PDF: Meaning & Benefits
मन्त्र गर्भ दत्तात्रेय अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् | Mantra Garbha Dattatreya Ashtottara Shatanama Stotram Lyrics
ओंकारतत्त्वरूपाय दिव्यज्ञानात्मने नमः ।
नभोतीतमहाधाम्न ऐंद्र्यृध्या ओजसे नमः ॥ १॥
नष्टमत्सरगम्यायागम्याचारात्मवर्त्मने ।
मोचितामेध्यकृतये ऱ्हींबीजश्राणितश्रिये ॥ २॥
मोहादिविभ्रमान्ताय बहुकायधराय च ।
भत्तदुर्वैभवछेत्रे क्लींबीजवरजापिने ॥ ३॥
भवहे- तुविनाशाय राजच्छोणाधराय च ।
गतिप्रकम्पिताण्डाय चारुव्यहतबाहवे ॥ ४॥
गतग- र्वप्रियायास्तु यमादियतचेतसे ।
वशिताजातवश्याय मुण्डिने अनसूयवे ॥ ५॥
वदद्व- रेण्यवाग्जाला-विस्पृष्टविविधात्मने ।
तपोधनप्रसन्नाये-डापतिस्तुतकीर्तये ॥ ६॥
तेजोमण्यन्तरङ्गाया-द्मरसद्मविहापने ।
आन्तरस्थानसंस्थायायैश्वर्यश्रौतगीतये ॥ ७॥
वातादिभययुग्भाव-हेतवे हेतुबेतवे ।
जगदात्मात्मभूताय विद्विषत्षट्कघातिने ॥ ८॥
सुरव-र्गोद्धृते भृत्या असुरावासभेदिने ।
नेत्रे च नयनाक्ष्णे चिच्चेतनाय महात्मने ॥ ९॥
देवाधिदेवदेवाय वसुधासुरपालिने ।
याजिनामग्रगण्याय द्रांबीजजपतुष्टये ॥ १०॥
वासनावनदावाय धूलियुग्देहमालिने ।
यतिसंन्यासिगतये दत्तात्रेयेति संविदे ॥ ११॥
यजनास्यभुजेजाय तारकावासगामिने ।
महाजवास्पृग्रूपाया-त्ताकाराय विरूपिणे ॥ १२॥
नराय धीप्रदीपाय यशस्वियशसे नमः ।
हारिणे चोज्वलाङ्गायात्रेस्तनूजाय सम्भवे ॥ १३॥
मोचितामरसङ्घाय धीमतां धीरकाय च ।
बलिष्ठविप्रलभ्याय यागहोमप्रियाय च ॥ १४॥
भजन्महिमविख़्यात्रेऽमरारिमहिमच्छिदे ।
लाभाय मुण्डिपूज्याय यमिने हेममालिने ॥ १५॥
गतोपाधिव्याधये च हिरण्याहितकान्तये ।
यतीन्द्रचर्यां दधते नरभावौषधाय च ॥ १६॥
वरिष्ठयोगिपूज्याय तन्तुसन्तन्वते नमः ।
स्वात्मगाथासुतीर्थाय मःश्रिये षट्कराय च ॥ १७॥
तेजोमयोत्तमाङ्गाय नोदनानोद्यकर्मणे ।
हान्याप्तिमृतिविज्ञात्र ओंकारितसुभक्तये ॥ १८॥
रुक्षुङ्मनःखेदहृते दर्शनाविषयात्मने ।
रांकवाततवस्त्राय नरतत्त्वप्रकाशिने ॥ १९॥
द्रावितप्रणताघाया-त्तःस्वजिष्णुःस्वराशये ।
राजन्त्र्यास्यैकरूपाय मःस्थायमसुबम्धवे ॥ २०॥
यतये चोदनातीत- प्रचारप्रभवे नमः ।
मानरोषविहीनाय शिष्यसंसिद्धिकारिणे ॥ २१॥
गङ्गे पादविहीनाय चोदनाचोदितात्मने ।
यवीयसेऽलर्कदुःख-वारिणेऽखण्डितात्मने ॥ २२॥
ऱ्हींबीजायार्जुनज्येष्ठाय दर्शनादर्शितात्मने ।
नतिसन्तुष्टचित्ताय यतिने ब्रह्मचारिणे ॥ २३॥
इत्येष सत्स्तवो वृत्तोयात् कं देयात्प्रजापिने ।
मस्करीशो मनुस्यूतः परब्रह्मपदप्रदः ॥ २४॥
॥ इति मन्त्रगर्भ श्री दत्तात्रेयाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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