Satudi Teej Vrat Katha – सातुड़ी तीज की पौराणिक व्रत कथा सातुड़ी तीज का पर्व भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की तृतीय तिथि के दिन मनाया जाता हैं सातुड़ी तीज का व्रत मुख्य रूप से उत्तर भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और बिहार के कुछ हिस्सों में मनाई जाती है। सातुड़ी तीज व्रत को खासतौर से सुहागिन महिलाओं और कुंवारी लड़कियों रखती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस सातुड़ी तीज व्रत को करने और पूजा करने से वैवाहिक जीवन सुखमय और अविवाहित लड़कियों को मनचाहा वर की प्राप्ति होती है। हमारे द्वारा आपको यहां सातुड़ी तीज की पौराणिक व्रत कथा के वारे में बताया जा रहा हैं।
Satudi Teej Vrat Mahatva Aur Katha – सुहागिनों के लिए सातुड़ी तीज व्रत कथा और महत्व
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सातुड़ी तीज रक्षाबंधन के तीन दिन बाद और कृष्ण जन्माष्टमी से पांच दिन पहले आती है इसे कजली तीज के रूप से मनाया भी जाता है। इस दिन नीम की पूजा की जाती है। यह उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। पालकी को सजाकर उसमें तीज माता की सवारी निकाली जाती है। इसमें हाथी, घोड़े, ऊंट, तथा कई लोक नर्तक और कलाकार हिस्सा लेते हैं। महिलाएं और लड़कियां इस दिन परिवार के सुख शांति की मंगल कामना में व्रत रखती है।
Satudi Teej Ki Katha – सुहागिनों के लिए शुभ व्रत कथा
एक साहूकार था उसके सात बेटे थे। उसका सबसे छोटा बेटा अपाहिज़ था। वह रोजाना एक वेश्या के पास जाता था। उसकी पत्नी बहुत पतिव्रता थी। खुद उसे कंधे पर बैठा कर वेश्या के यहां ले जाती थी। बहुत गरीब थी। जेठानियों के पास काम करके अपना गुजारा करती थी।
भाद्रपद के महीने में कजली तीज के दिन सभी ने तीज माता के व्रत और पूजा के लिए सातु बनाए। छोटी बहु गरीब थी उसकी सास ने उसके लिए भी एक सातु का छोटा पिंडा बनाया। शाम को पूजा करके जैसे ही वो सत्तू पासने लगी उसका पति बोला मुझे वेश्या के यहां छोड़ कर आ।
हर दिन की तरह उस दिन भी वह पति को कंधे पैर बैठा कर छोड़ने गई, लेकिन वो बोलना भूल गया, ”तुम जाओ। वह बाहर ही उसका इंतजार करने लगी इतने में जोर से वर्षा आने लगी और बरसाती नदी में पानी बहने लगा। कुछ देर बाद नदी आवाज़ से आवाज़ आई…आवतारी जावतारी दोना खोल के पी, पिया प्यारी होय… आवाज़ सुनकर उसने नदी की तरफ देखा तो दूध का दोना नदी में तैरता हुआ आता दिखाई दिया। उसने दोना उठाया और सात बार उसे पी कर दोने के चार टुकड़े किये और चारों दिशाओं में फेंक दिए।
उधर तीज माता की कृपा से वेश्या अपना सारा धन उसके पति को वापस देकर सदा के लिए वहां से चली गई। पति ने सारा धन लेकर घर आकर पत्नी को आवाज़ दी -दरवाज़ा खोल….तो उसकी पत्नी ने कहा मैं दरवाज़ा नहीं खोलूंगी। तब उसने कहा कि अब मैं वापस नहीं जाऊंगा।
दोनों मिलकर सातु पासेगें। लेकिन उसकी पत्नी को विश्वास नहीं हुआ, उसने कहा मुझे वचन दो वापस वेश्या के पास नहीं जाओगे। पति ने पत्नी को वचन दिया तो उसने दरवाज़ा खोला और देखा उसका पति गहनों और धन माल सहित खड़ा था। उसने सारे गहने कपड़े अपनी पत्नी को दे दिए। फिर दोनों ने बैठकर सातु पासा।
सुबह जब जेठानी के यहां काम करने नहीं गई तो बच्चे बुलाने आये काकी चलो सारा काम पड़ा है। उसने कहा अब तो मुझ पर तीज माता की पूरी कृपा है अब मै काम करने नहीं आऊंगी। बच्चों ने जाकर मां को बताया, आज से काकी काम करने नहीं आएगी उन पर तीज माता की कृपा हुई है, वह नए-नए कपड़े गहने पहन कर बैठी हैं और काका जी भी घर पर बैठे हैं। सभी लोग बहुत खुश हुए। हे तीज माता! जैसे आप उस पर प्रसन्न हुई वैसे ही सब पर प्रसन्न होना, सब के दुःख दूर करना।

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