Ganga Stuti in Hindi: गंगा स्तुति जो भी जातक गंगा स्तुति को गंगा दशहरा के दिन गंगा के जल में खड़ा होकर 10 बार पठन करता हैं तो उसके जीवन से दरिद्रता का नाश होने लगता हैं। इस ‘श्री गंगा स्तुति’ (Shri Ganga Stuti) का संकल्प करके ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा तिथि से लेकर दशमी तक रोज-रोज एक बढ़ते हुए क्रम में पठन करता हैं तो उस जातक के सभी पापों का नाश हो जाता हैं। माँ गंगा स्तुति आदि के बारे में बताने जा रहे हैं।
Ganga Stuti in Hindi: स्नान के समय करें इस चमत्कारी गंगा स्तुति का पाठ, धुल जाएंगे जन्मों के पाप
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हमारे सनातन धर्म में माता गंगा को नदी नहीं बल्कि एक माता मानकर पूजा जाता हैं, इसलिए इसे मोक्षदायिनी और पापों का नाश करने की देवी के नाम से जाना जाता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, जो भी व्यक्ति गंगा स्नान करने से पहले या उस समय या फिर नहाते समय नीचे बताई गई ‘श्री गंगा स्तुति’ (Shri Ganga Stuti) का श्रद्धा के साथ पाठ करता है, उसे साक्षात अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।
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बताया जा रही गंगा स्तुति (Ganga Stuti) इतनी शक्तिशाली है कि इसके पाठ मात्र से व्यक्ति के परिवार में अकाल मृत्यु का भय, भयंकर रोग और घर की दरिद्रता तुरंत समाप्त होने लगती है। Freeupay.in के इस विशेष लेख में पढ़ें संपूर्ण गंगा स्तुति, इसे जपने के नियम और इसके अचूक लाभ।
🌺 क्विक लिस्ट: श्री गंगा स्तुति पाठ के चमत्कारिक लाभ (Ganga Stuti Benefits)
श्री गंगा स्तुति (Shri Ganga Stuti) जानकारी पाने के लिए इस टेबल को पढ़ें। जानिए रोज़ाना गंगा स्तुति पढ़ने से आपके जीवन में क्या बदलाव आते हैं:
| पाठ का विवरण (Details) | श्री गंगा स्तुति पढ़ने के लाभ (Benefits) |
| पापों का समूल नाश | इसके पाठ से जाने-अनजाने में हुए जन्म-जन्मांतर के भयंकर पाप तुरंत कट जाते हैं। |
| मानसिक शांति और मोक्ष | भयंकर तनाव (Depression) और नकारात्मक विचार खत्म होते हैं तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। |
| अपार धन और सुख | घर का वास्तु दोष दूर होता है, रुका हुआ पैसा वापस आता है और सुख-समृद्धि बढ़ती है। |
| पाठ का सर्वोत्तम समय | रोज़ सुबह स्नान करते समय या पूजा के दौरान इसका पाठ करना सबसे शुभ फलदायी है। |
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📿 श्री गंगा स्तुति पाठ (Shri Ganga Stuti Lyrics)
यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अत्यंत पवित्र और सिद्ध गंगा स्तुति श्री गंगा स्तुति (Shri Ganga Stuti) है। पूर्ण श्रद्धा और साफ वस्त्र धारण करके माता गंगा का ध्यान करें और इस स्तुति का पाठ करें:
जय जय भगीरथ-नन्दिनि, मुनि-चकोर-चन्दिनि, नर-नाग-सुर-वन्दिनि जय जह्नुकन्ये।
जय त्रिपुरहर-मौली-विहारिणि, भव-भय-हारिणि, पाप-विदारिणि, पुण्य-धन्ये॥
संशित-पवन-पावन-पयोदे, मोद-प्रदे, भव-ताप-विनाशिनी।
सुख-सम्पति-दायिनि, कलिमल-हारिनि, त्रय-ताप-निवारिणी, जग-प्रकाशिनी॥
जय जय सगर-सुत-तारिणि, शोक-निवारिणि, सुर-मुनि-नर-किन्नर-पूजित-पावन-चरणे।
शरण-आगत-प्रतिपालिनि, दीन-दयालनि, कलि-काल-कुचाल-विनाशिनि-शरणे॥
जयति जयति जग-पावनि, ताप-नशावनि, सुख-सम्पति-दायिनि, सुरसरि-गंगे।
दास-तुलसी-शरण-आगत, राखहु निज चरनन-संगे॥
📿 श्री गंगा स्तुति पाठ (Shri Ganga Stuti Lyrics)
यह मुनि वसिष्ठ जी द्वारा रचित अत्यंत पवित्र और सिद्ध गंगा स्तुति श्री गंगा स्तुति (Shri Ganga Stuti) है। पूर्ण श्रद्धा और साफ वस्त्र धारण करके माता गंगा का ध्यान करें और इस स्तुति का पाठ करें:
॥भुजङ्गप्रयातम् गीर्वाणभाषा॥
पूर्वकथा: मुनि वसिष्ठ की गाय नंदिनी एक गहरे गड्ढे में गिर गई। मुनि ने जब अपनी गाय को असहाय स्थिति में देखा तब कातर स्वर में सहायता के लिए माँ गंगा की स्तुति करने लगे।
नमस्ते नमस्ते नमो देवि गङ्गे, नमो जह्नुजे पूतपाथस्तरङ्गे।
नमस्ते कपर्दासने भर्गजाये, नमस्ते ज्वलत्सम्बरे मूलमाये॥१॥
हे देवी गंगा! जह्नु की पुत्री, पवित्र जल की तरंगवाली, जटा के आसनवाली, महादेव की स्त्री, उज्ज्वल जलवाली, आप महामाया हैं।
नमः सर्वसूरर्च्यजङ्घालनीरे, नमो मुक्तिसोपानभूतेऽच्छतीरे।
अवेव त्वमैन्द्रीरमोंमादिभूते, नमस्तेऽघंसंहारिके भास्वदूते॥२॥
सबको उत्पन्न करने वाली, अतिवेगवान् जल जिसका पूजनीय है, ऐसी मोक्ष की सीढ़ी रूप सुंदर तटवाली, तेरे अर्थ नमस्कार है। तू यहाँ पर आकर रक्षा कर। हे इन्द्र की शक्ति लक्ष्मी! पार्वती आदि में रहने वाले पापों का नाश करने वाली, आपका प्रवाह देदीप्यमान है।
नमस्ते सुपर्वापगे शुद्धभावे, नमस्तेऽस्तु संसारपाथोधिनावे।
नमस्ते तटिन्नयुत्तमे तुङ्गकूले, नमोऽस्त्वम्ब ते सागरोद्धारमूले॥३॥
ऐसी देवगंगा शुद्धभाववाली, संसाररूपी समुद्र की नाव, उत्तम नदी ऊंचे किनारों वाली, माता! आयासगर वंश का उद्धार करने वाली है।
नमस्ते स्वभक्ताय कैवल्यदायै, नमो हेलयैवाऽघशैलापहायै।
नमस्ते सुवर्णाऽद्रिकूटस्रवलन्त्यै, नमो मेनकेशादगादुच्छलन्त्यै॥४॥
अपने भक्तों को मुक्ति देने वाली, अपनी लीला से ही पापरूपी पहाड़ों का नाश करने वाली, सुमेरु पर्वत से बहने वाली, और हिमालय पर्वत से उछलने वाली है।
नमो जन्मभेत्र्यै नमो विष्णुपद्यै, नमोऽनूननेत्र्यै नमो नाकनद्यै।
इमां नन्दिनीमुद्धराऽशु त्वमार्ये, नमस्ते नमस्तेऽस्त्वकूपारभार्ये॥५॥
जन्म–मरण को काटने वाली, विष्णु के पद से निकली हुई विशाल स्वर्गनदी, हे आर्या! तू शीघ्र इस नन्दिनी को निकाल।
नमोस्तुर्मिचञ्चद्ध्रुवस्थानमीने, नमस्तारकामण्डलाऽऽस्फाललीने।
नमस्त्र्यध्वगे भर्म्मभूभृत्पताके, नमः पीतसिक्पत्तडित्वद्वलोके॥६॥
हे समुद्र की स्त्री! तरंगों से उज्ज्वल आकाश को नापने वाली, आकाश मण्डल को लांघकर छिप जाने वाली, स्वर्ग, भूमि, पाताल तीनों मार्गों को जाने वाली, सुमेरु पर्वत की ध्वजा, पीताम्बर धारण करने से बिजली वाले मेघ में बुगले के समान जिसके चरण शोभित हैं। ऐसी गंगा को नमस्कार है!
।।दोहा।।
सुनि नीलिंपतटिनी सुजस, मुनि वशिष्ठ सों एम।
प्रकट अवट मध्यहि भई, श्रोत विरचि सह प्रेम॥
देव नदी गंगा ने मुनि वशिष्ट के मुंह से अपना यह सुयश सुनकर इस भयंकर गड्ढे से अपना प्राकट्य किया और वह अपनी पावन धारा सहित प्रकट हुई।गंगा के इसी प्रवाह में तैरती हुई सुरभि पुत्री नंदिनी गाय सुखपूर्वक उस खड्डे से बाहर आई और गंगा अपना नदी रूप धरकर सागर से मिलने को गई।
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📿 श्री गंगा स्तुति पाठ (Shri Ganga Stuti Lyrics)
यह श्री गंगा स्तुति (Shri Ganga Stuti) श्री महा भागवत पुराण कथा के अन्तर्गत जह्नु मुनि द्वारा की गंगा स्तुति का पाठ किया गया गया था। यह समस्त व्यक्ति के पापों का नाश करके मोक्ष देने वाली हैं।
मुनिरुवाच
मातस्त्वं परमासि शक्तिरतुला सर्वाश्रया पावनी, लोकानां सुखमोक्षदाऽखिलजगत्संवन्द्यपादाम्बुजा ।
न त्वां वेद विधिर्न वा स्मररिपुर्नो वा हरिर्नापरे, सञ्जानन्ति शिवे महेशशिरसा मान्ये कथं वेद्मयहम् ॥ १॥
जनुमुनि बोले- माता ! आप सर्वश्रेष्ठ, अतुलनीया पराशक्ति, सर्वाश्रयदात्री, लोगों को पवित्र करनेवाली, आनन्द और मोक्ष को प्रदान करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्द्वारा वन्दित चरणकमलवाली हैं। आपको ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश (तत्त्वतः) नहीं जानते तथा अन्य लोग भी नहीं जानते। भगवान् शिव के मस्तक से सम्मानित शिवे ! फिर मैं आपको कैसे जान सकता हूँ ॥ १ ॥
किं तेऽहं प्रवदामि रूपचरितं यच्चेतसो दुर्गमं, पारावारविवर्जितं सुरधुनी ब्रह्मादिभिः पूजिता ।
स्वेच्छाचारिणि संवितत्य करुणां स्वीयैर्गुणैर्मां शिवे, पुण्यं त्वं तु कृतागसं शरणगं गङ्गे क्षमस्वाम्बिके ॥ २॥
मैं आपके अचिन्त्य और अपार रूप तथा चरित्र का क्या वर्णन करूँ? ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा पूजित आप सुरनदी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। स्वतन्त्ररूप से विचरण करनेवाली शिवे! मातः ! आप अपने शुभ गुणों से पुण्य तथा करुणा का विस्तार करके मुझ कृतापराध और शरणागत को क्षमा कीजिये ॥ २ ॥
धन्यं मे भुवि जन्म कर्म च तथा धन्यं तपो दुष्करं, धन्यं मे नयनं यतस्त्रिनयनाराध्या दृशाऽऽलोकये ।
धन्यं मत्करयुग्मकं तव जलं स्पृष्टं यतस्तेन वै, धन्यं मत्तनुरप्यहो तव जलं तस्मिन्यतः सङ्गतम् ॥ ३॥
मेरा इस पृथ्वी पर जन्म और कर्म दोनों धन्य हुए, मेरी कठिन तपस्या धन्य हुई तथा मेरे ये दोनों नेत्र भी धन्य हुए; जो त्रिलोचन भगवान् शंकर की आराध्या आपका मैं अपने नेत्रों से दर्शन कर रहा हूँ । आपके जल के स्पर्श से ये मेरे दोनों हाथ धन्य हो गये और यह मेरा शरीर भी धन्य हुआ, जिसमें आपका पावन जल गया है ॥ ३ ॥
नमस्ते पापसंहर्त्रि हरमौलिविराजिते ।
नमस्ते सर्वलोकानां हिताय धरणीगते ॥ ४॥
पापों का संहार करनेवाली, भगवान् शंकर के मस्तक पर विराजमान तथा सभी प्राणियों के हित के लिये पृथ्वी पर अवतीर्ण आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ४ ॥
स्वर्गापवर्गदे देवि गङ्गे पतितपावनि ।
त्वामहं शरणं यातः प्रसन्ना मां समुद्धर ॥ ५॥
देवी गंगे ! आप स्वर्ग और मोक्ष देनेवाली हैं, पतितों को पवित्र करनेवाली हैं, मैं आपकी शरण में हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न होकर मेरा उद्धार कीजिये ॥ ५ ॥
॥ इति श्रीमहाभागवते महापुराणे जह्नुमुनिकृता गङ्गास्तुतिः सम्पूर्णा ॥
॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत जह्नुमुनि द्वारा की गयी गंगा-स्तुति सम्पूर्ण हुई ॥
📿 श्री गंगा स्तुति पाठ (Shri Ganga Stuti Lyrics)
यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अत्यंत पवित्र और सिद्ध गंगा स्तुति श्री गंगा स्तुति (Shri Ganga Stuti) है। पूर्ण श्रद्धा और साफ वस्त्र धारण करके माता गंगा का ध्यान करें और इस स्तुति का पाठ करें:
जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि,
नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि जय जह्नु बालिका।
बिस्नु-पद-सरोजजासि, ईस-सीसपर बिभासि,
त्रिपथगासि, पुन्यरासि, पाप-छालिका।।1।।
बिमल बिपुल बहसि बारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर बर बिभंगतर तरंग-मालिका।
पुरजन पूजोपहार, सोभित ससि धवलधार,
भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका।।2।।
निज तटबासी बिहंग, जल-थर-चर पसु-पतंग,
कीट, जटित तापस सब सरिस पालिका।
तुलसी तव तीर तीर सुमिरत रघुबंस-बीर,
बिचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका।।3।।
(पाठ पूर्ण होने के बाद माता गंगा को प्रणाम करें और तांबे के पात्र में रखे जल को पूरे घर में छिड़क दें।)
जानें: रुद्राक्ष कौन-कौनसी समस्या को दूर कर सकता हैं?
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⚠️ गंगा स्तुति पाठ और स्नान के 3 कड़े नियम
- पवित्रता का ध्यान: यदि आप घर में स्नान करते समय इसका पाठ कर रहे हैं, तो इसे मन ही मन (मानसिक जाप) करें। पूजा घर में पाठ करते समय हमेशा कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
- जल का आदर: स्तुति पाठ वाले दिन या स्नान के बाद जल को व्यर्थ न बहाएं। जल साक्षात माता गंगा का स्वरूप है। इसकी बर्बादी से भारी आर्थिक तंगी और दोष लगता है।
- सात्विक आचरण: जिस घर में गंगा स्तुति का नियमित पाठ होता है, वहां पूर्ण सात्विकता होनी चाहिए। घर के सदस्यों को छल-कपट और मांस-मदिरा से दूर रहना चाहिए।
Ganga Stuti Lyrics in Sanskrit & Hindi 2026❓अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: क्या गंगा स्तुति और गंगा चालीसा एक ही हैं?
Ans: नहीं, गंगा स्तुति (विशेषकर तुलसीदास जी या आदि शंकराचार्य द्वारा रचित) माता गंगा की वंदना का एक संक्षिप्त और काव्यात्मक रूप है, जबकि गंगा चालीसा 40 चौपाइयों का एक विस्तृत पाठ है। दोनों का फल अत्यंत शुभ है।
Q2: गंगा स्तुति का पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए?
Ans: अपनी मनोकामना की शीघ्र पूर्ति और मानसिक शांति के लिए गंगा स्तुति का पाठ रोज़ाना सुबह कम से कम 1 बार करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
Q3: बिना गंगाजल के गंगा स्नान का पुण्य कैसे पाएं?
Ans: नहाने के पानी में अपनी तर्जनी उंगली से ‘ॐ’ बनाएं और “गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति” मंत्र के साथ ‘श्री गंगा स्तुति’ का पाठ करें। इससे घर पर ही गंगा स्नान का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
निष्कर्ष: श्री गंगा स्तुति वह अचूक और दिव्य मार्ग है जो आपके जीवन की हर बाधा को नष्ट कर सकता है। Freeupay.in पर दिए गए नियमों के साथ आज ही से अपने दैनिक स्नान या पूजा में इसका पाठ शुरू करें। माता गंगा की कृपा से आपके घर में कभी भी धन, सुख और शांति की कमी नहीं रहेगी।
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