Vat Savitri Vrat Katha: हम यहाँ आपको ‘वट सावित्री व्रत’ (Vat Savitri Vrat) कथा के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। हमारे हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ की तरह ही ‘वट सावित्री व्रत’ करने का विशेष महत्व बताया गया है। यह व्रत सुहागिन महिला अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन के संबध में किया जाने वाला माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन ही माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से बचाए थे।
Vat Savitri Vrat Katha: वट सावित्री व्रत की संपूर्ण कथा और अचूक पूजा विधि, पढ़ें सत्यवान-सावित्री की कहानी
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इस व्रत में ‘वट वृक्ष’ (बरगद के पेड़) की पूजा की जाती है और व्रत के दौरान सत्यवान-सावित्री की कथा (Satyavan Savitri Katha) पढ़ना या सुनना बेहद अनिवार्य माना गया है। कथा के बिना यह व्रत अधूरा रहता है। Freeupay.in के इस विशेष लेख में पढ़ें वट सावित्री व्रत की प्रामाणिक कथा (Vat Savitri Vrat Katha) और संपूर्ण पूजा विधि।
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🌸 क्विक लिस्ट: वट सावित्री व्रत कथा एक नज़र में (Vat Savitri Vrat Katha)
वट सावित्री व्रत कथा जानकारी पाने के लिए इस टेबल को देखें:
| व्रत का विवरण | महत्वपूर्ण जानकारी (Key Details) |
| व्रत का उद्देश्य | पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य (Akhand Saubhagya) की प्राप्ति। |
| मुख्य देवता | ब्रह्मा, विष्णु, महेश (वट वृक्ष में वास) और माता सावित्री। |
| पूजा का मुख्य स्थान | वट वृक्ष (बरगद का पेड़ – Banyan Tree) के नीचे। |
| वट सावित्री व्रत की तारीख | 14 मई, 2026 (गुरुवार) से 29 अप्रैल, 2026 (सोमवार) तक |
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📖 वट सावित्री व्रत की संपूर्ण कथा (Satyavan Savitri Katha in Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में मद्रदेश में अश्वपति नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे बड़े धर्मात्मा, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे। राजा को सब प्रकार का सुख था, किन्तु कोई सन्तान नहीं थी। इसलिये उन्होंने सन्तान प्राप्ति की कामना से अठारह वर्षों तक पत्नि सहित सावित्री देवी का विधि पूर्वक व्रत तथा पूजन कठोर तपस्या की। सर्वगुण देवी सावित्री ने प्रसन्न होकर पुत्री के रूप में अश्वपति के घर जन्म लेने का वर दिया।
सावित्री का जन्म
यथासमय राजा की बड़ी रानी के गर्भ से एक परम तेजस्विनी सुन्दर कन्या ने जन्म लिया। राजा ने उस कन्या का नाम सावित्री रखा। राजकन्या शुक्ल पक्षके चन्द्रमा की भाँति दिनों-दिन बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उसने युवावस्था में प्रवेश किया। उसके रूप-लावण्य को जो भी देखता उसपर मोहित हो जाता।
सावित्री के विवाह का विचार
कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने सावित्री के विवाह का विचार किया । राजा के विशेष प्रयास करने पर भी सावित्री के योग्य कोई वर नहीं मिला। उन्होंने एक दिन सावित्री से कहा—‘बेटी ! अब तुम विवाह के योग्य हो गयी हो, इसलिये स्वयं अपने योग्य वर की खोज करो।’
पिता की आज्ञा स्वीकार कर सावित्री योग्य मन्त्रियों के साथ स्वर्ण-रथपर बैठकर यात्रा के लिये निकली। कुछ दिनों तक ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों के तपोवनों और तीर्थोंमें भ्रमण करने के बाद वह राजमहल में लौट आयी। उसने पिता के साथ देवर्षि नारद को बैठे देखकर उन दोनों के चरणों में श्रद्धा से प्रणाम किया। महाराज अश्वपति ने सावित्री से उसी यात्रा का समाचार पूछा सावित्री ने कहा—पिताजी ! तपोवन में अपने माता-पिता के साथ निवास कर रहे द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान् सर्वथा मेरे योग्य हैं। अतः सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है।’
ग्रहो की गणना
नारद जी सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहो की गणना कर राजा अश्वति से बोले—‘राजन ! सावित्री ने बहुत बड़ी भूल कर दी है। सत्यवान् के पिता शत्रुओं के द्वारा राज्य से वंचित कर दिये गये हैं, वे वन में तपस्वी जीवन व्यतीत कर रहे हैं और अन्धे हो चुके हैं।
सबसे बड़ी कमी यह है कि सत्यवान् की आयु अब केवल एक वर्ष ही शेष है। और सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान कि मृत्यु हो जायेगी।’
नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति व्यग्र हो गये। उन्होंने सावित्री से कहा—‘बेटी ! अब तुम फिर से यात्रा करो और किसी दूसरे योग्य वर का वरण करो।’
सावित्री सती थी। उसने दृढ़ता से कहा—‘पिताजी ! आर्य कन्या होने के नाते जब मै सत्यवान का वरण कर चुकी हूँ तो अब सत्यवान् चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, अब तो वही मेरे पति बनेगें। जब मैंने एक बार उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया, फिर मैं दूसरे पुरुषका वरण कैसे कर सकती हूँ?’
सावित्री का निश्चय दृढ़ जानकर महाराज अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान् से कर दिया।सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञातकर लिया तथा अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल मे रहने लगी । धीरे-धीरे वह समय भी आ पहुँचा, जिसमें सत्यवान् की मृत्यु निश्चित थी।
सावित्री ने नादरजी द्वारा बताय हुये दिन से तीन दिन पूर्व से ही निराहार व्रत रखना शुरू कर दिया था। नारद द्वारा निश्चित तिथि को पति एवं सास-ससुर की आज्ञा से सावित्री भी उस दिन पति के साथ जंगल में फल-मूल और लकड़ी लेने के लिये गयी।
सत्यवान वन में पहुँचकर लकडी काटने के लिए बड के पेड पर चढा। अचानक वृक्ष से लकड़ी काटते समय सत्यवान् के सिर में भंयकर पीडा होने लगी और वह पेड़ से नीचे उतरा।
सावित्री ने उसे बड के पेड के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी गोद में रख लिया (कही-कही ऐसा भी उल्लेख मिलता हैं कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डस लिया था)।
यमराज का आगमन:
उसी समय सावित्री को लाल वस्त्र पहने भयंकर आकृति वाला एक पुरुष दिखायी पड़ा। वे साक्षात् यमराज थे। यमराज ने ब्रम्हा के विधान के रूप रेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सावित्री से कहा—‘तू पतिव्रता है।
तेरे पति की आयु समाप्त हो गयी है। मैं इसे लेने आया हूँ।’ इतना कहकर देखते ही देखते यमराज ने सत्यवान के शरीर से सूक्ष्म जीवन को निकाला और सत्यवान के प्राणो को लेकर वे दक्षिण दिशा की ओर चल दिये। सावित्री भी सत्यावान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे पीछे चल दी। पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया।
इस पर वह बोली महराज जहा पति वही पत्नि। यही धर्म है, यही मर्यादा है । सावित्री की बुद्धिमत्ता पूर्ण और धर्मयुक्त बाते सुनकर यमराज का हृदय पिघल गया। सावित्री के धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले पति के प्राणो से अतिरिक्त कुछ भी माँग लो।
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सावित्री के 3 वरदान:
सावित्री ने यमराज से सास-श्वसुर के आँखो ज्योती और दीर्घायु माँगी। यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ गए सावित्री भी यमराज का पीछा करते हुये रही।
यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापिस लौटे जाने को कहा तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन के कोई सार्थकता नही।
यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान माँगने के लिये कहा इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापिस दिलाने की प्रार्थना की।
तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिए सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही इस बार सावित्री ने सौ पुत्रो का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं पुत्रो का वरदान दिया है पर पति के बिना मैं माँ किस प्रकार बन सकती हूँ, अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए। सावित्री की धर्मनिष्ठा,ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणो को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया।
सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुँची जहाँ सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुँची जहाँ सत्यवान का मृत शरीर रखा था. सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा।
प्रसन्नचित सावित्री अपने सास-श्वसुर के पास पहुँची तो उन्हे नेत्र ज्योती प्राप्त हो गई इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हे मिल गया आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रो की माता बनी।
इस प्रकार सावित्री ने सतीत्व के बल पर न केवल अपने पति को मृत्यु के मुख से छीन लिया बल्कि पतिव्रत धर्म से प्रसन्न कर यमराज से सावित्री ने अपने सास-ससुर की आँखें अच्छी होने के साथ राज्यप्राप्त का वर, पिता को पुत्र-प्राप्ति का वर और स्वयं के लिए पुत्रवती होने के आशीर्वाद भी ले लिया। तथा इस प्रकार चारो दिशाएँ सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूँज उठी।
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🌟 वट वृक्ष का महत्व और ज्योतिषीय रहस्य
सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में ‘वट वृक्ष’ को साक्षात देवतुल्य माना गया है। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित ललित त्रिवेदी जी बताते हैं कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। इस पेड़ के नीचे की गई पूजा सीधे त्रिदेवों तक पहुँचती है।
अखंड सौभाग्य की प्राप्ति, वैवाहिक जीवन के सभी क्लेशों को दूर करने और शिव-पार्वती जैसा अटूट प्रेम पाने के लिए सुहागिन महिलाओं को साक्षात माता गौरी और भगवान शिव का स्वरूप ‘गौरी-शंकर रुद्राक्ष’ (Gauri Shankar Rudraksha) धारण करना चाहिए। यह रुद्राक्ष दांपत्य जीवन के हर संकट को काट देता है और पति-पत्नी के बीच प्रेम को अमर बनाता है।
Vat Savitri Vrat Katha in Hindi PDF❓अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: वट सावित्री की पूजा में काले चने का क्या महत्व है?
Ans: काले चने को साक्षात यमराज का प्रतीक माना जाता है। कथा के अनुसार, यमराज ने सत्यवान के प्राण एक काले चने के रूप में ही सावित्री को लौटाए थे। इसलिए पूजा में काले चने का प्रयोग अनिवार्य है।
Q2: वट सावित्री का व्रत निर्जला होता है या फलाहारी?
Ans: यह व्रत व्रती (महिला) की शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। कई महिलाएं इसे करवा चौथ की तरह निर्जला (बिना जल के) रखती हैं, जबकि कुछ महिलाएं पूजा के बाद जल और फल ग्रहण कर लेती हैं।
Q3: क्या कुंवारी लड़कियां (Unmarried Girls) वट सावित्री का व्रत रख सकती हैं?
Ans: यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए केवल भगवान शिव की पूजा कर सकती हैं, इस व्रत का विधान मुख्य रूप से सुहागिनों के लिए है।
निष्कर्ष: वट सावित्री का व्रत केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह एक स्त्री के दृढ़ निश्चय, प्रेम और पतिव्रता धर्म की सबसे बड़ी मिसाल है। Freeupay.in पर दी गई इस व्रत कथा और विधि को अपनाकर आप भी माता सावित्री की कृपा प्राप्त कर सकती हैं।
अभी शेयर करें: यह व्रत कथा हर सुहागिन महिला के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूजा के दिन कथा पढ़ने के लिए इस लिंक को अपनी सहेलियों, परिवार और सभी WhatsApp ग्रुप्स में तुरंत शेयर करें!
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